यन्त्रिक विधियाँ | स्थायी विधियों | गर्भावस्‍था का चिकित्सीय समापन | यौन संचारित रोग |

यन्त्रिक विधियाँ

  • यन्त्रिक विधियों के अंतर्गत रोधक साधनों के माध्यम से अंडाणु और शुक्राणु को भोतिक रूप से मिलने से रोका जाता है। इस प्रकार के उपाय पुरुष एवं स्त्री, दोनों के लिए उपलब्ध हें।
  • यन्त्रिक विधियाँ निम्न प्रकार की हैंकंडोम, डायाफ्रॉम, गर्भाशय ग्रीवा टोपी, वाल्ट और अन्तः गर्भाशय युक्त
  • कंडोम ( निरोध ) को पतली रबर या लेटेक्स से बनाया जाता है ताकि इस के उपयोग से पुरुष के लिंग या स्त्री की योनि एवं गर्भाशय ग्रीवा को संभोग से ठीक पहले, ढक दिया जाए और स्खलित शुक्राणु स्त्री के जननमार्ग में नहीं घुस सके। यह गर्भाधान को बचा सकता हे। यह गर्भधारण के साथ-साथ यौन संचारित रोगों तथा एड्स के संक्रमण से भी बचाता है।
  • डायाफ्रॉम, गर्भाशय ग्रीवा टोपी तथा वॉल्ट रबर से बने रोधक  उपाय हैं जो स्त्री के जनन मार्ग में सहवास के पूर्व गर्भाशय ग्रीवा को हकने के लिए लगाए जाते हैं। ये गर्भाशय ग्रीवा को ढक कर शुक्राणुओं के प्रवेश को रोककर गर्भाधान को राकते हैं। इन्हें पुन: इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही इन रोधक साधनों के साथ-साथ शुक्राणुनाशक क्रीम, जेली एवं फोम (झाग) का प्राय: इस्तेमाल किया जाता है, जिससे इनकी गर्भनिरोधक क्षमता काफी बढ़ जाती है।

 

  • अंतः गर्भाशयी यन्त्र डॉक्टरों द्वारा योनि मार्ग से गर्भाशय में लगाई जाती हैं। आजकल विभिन्‍न प्रकार की अंत: गर्भाशयी युक्तियाँ उपलब्ध हैं जैसे कि औषधिरहित आई यू डी (उदाहरण -. लिप्पेस लूप), ताबा मोचक आई यू डी (कॉपर-टी, कॉपर-7, मल्टीलोड 375) तथा हॉर्मोन मोचक आई यू डी (प्रोजेस्टासर्ट, एल एन जी-20)।
  • आई यू डी गर्भाशय के अंदर शुक्राणुओं की भक्षकाणुक्रिया (फैगोसाइटोसिस) बढ़ा देती हैं और मोचित कॉपर आयन शुक्राणुओं की गतिशीलता तथा उनकी निषेचन क्षमता को कम करते हैं।
  • इसके अतिरिक्त हॉमोंन मोचक आइ यू डी गर्भाशय को भ्रूण के रोपण के लिए अनुष्युक्त तथा गर्भाशय ग्रीवा को शुक्राणुओं का विरोधी बनाते हैं। जो औरतें गर्भावस्‍था में देरी या बच्चों के जन्म में अंतराल चाहती हैं, उनके लिए आई यू डी आदर्श गर्भनिरोधक हैं। भारत में गर्भनिरोध की यह विधियाँ व्यापक रूप से प्रचलित हैं।

 

  • दैहिकी (मुखीय) यन्त्र (हॉर्मोनल) में जन्म नियंत्रण करने वाली गोलियाँ शामिल हें। महिलाओं के द्वारा खाया जाने वाला एक अन्य गर्भनिरोधक प्रोजेस्टोजन अथवा प्रोजेस्टोजन और एस्ट्रोजज का संयोजन है जिसे थोड़ी मात्रा में मुँह द्वाव लिया जाता है। यह टिकिया के रूप में ली जाती है और “गोलियों” ( पिल्‍्स ) के नाम से लोकप्रिय है। गर्भनिरोधक गोलियों की क्रिया की विधि
    • यह अण्डोत्सर्ग के लिए आवश्यक FSH और LH के स्रावण को रोककर अण्डोत्सर्ग की जाँच करती है।
    • शुक्राणुओं के प्रवेश को रोकने/मंद करने के लिए यह गर्भाशय ग्रीवा के श्लेष्मा की गुणवत्ता को संशोधित करती है। यह गर्भाशय ग्रीवा में श्लेष्मा के स्तर को मोटा कर देती है जिसके फलस्वरूप शुक्राणु के लिए गर्भ में प्रवेश करना तथा अण्डाणु तक पहुँचना कठिन हो जाता है।
    • गर्भाशय के स्तर में परिवर्तन करके यह गर्भावस्‍था को बाधित करती है इसलिए निषेचित अण्डाणु के प्रत्यारोपित होने की संभावना समाप्त हो जाती है।
  • सहेली नामक गर्भनिरोधक गोली, महिलाओं के लिए, एक गैर-स्टेरॉइडली सामग्री है। इसकी खोज भारत में लखनऊ के केंद्रीय औषध अनुसंधान संस्थान (सेंट्रल ड्ूग रिसर्च इन्स्टीट्यूट-सी डी आर आई) ने की है। इसका कार्य एस्ट्रोजन के क्रियान्वयन को बाधित करना है। गर्भावस्‍था को रोकने के लिए हार्मोन एस्ट्रोजज का उपयोग करने के बजाय, इसमें एस्ट्रोजन को अवरुद्ध करने वाली औषधि शामिल होती है।
  • गोली MALA D प्रतिदिन एवं गोली सहेली सप्ताह में एक बार खायी जाती है।
  • स्त्रियों द्वारा प्रोजेस्टोजन अकेले या फिर एस्ट्रोजज के साथ इसका संयोजन भी टीके या त्वचा के नीचे अंतरोप (इंप्लांट) के रूप में किया जा सकता है।
  • गर्भनिरोधक प्रत्यारोपण छोटे पतले लचीले रॉड से बना होता है। इनका उपयोग त्वचा के नीचे किया जा सकता है। इनका प्रभाव गर्भनिरोधक गोलियों की तरह ही होता है। इससे प्रोजेस्टोजन की अल्प मात्रा अवमुक्त होती है जो अण्डोत्सर्ग को अवरुद्ध करती है तथा गर्भाशय ग्रीवा में श्लेष्मा को मोटा कर देती है जिससे शुक्राणु का अण्डाणु से मिलना मुश्किल हो जाता है। साथ ही अण्डाणु का निषेचित होना संभव नहीं होता है।
  • मैथुन के 72 घंटे के अन्दर प्रोजेस्टोजन या प्रोजेस्टोजन-एस्ट्रोजन सयोजन का प्रयोग आपातकालिक गर्भनिरोधक के रूप में बलात्कार या सामान्य असुरक्षित यौन संबंधों के कारण संभावित सगर्भता से बचने के लिए किया.जा सकता है।

स्थायी विधियों

  • शल्यक्रिया बिधियाँ जिन्हें बंध्धकरण भी कहते हैं; प्रायः उन लोगों के लिए सुझाई जाती हैं, जिन्हें आगे गर्भावस्‍था नहीं चाहिए तथा वे इसे स्थाई माध्यम के रूप में (पुरुष/स्त्री में से एक) अपनाना चाहते हैं। शल्यक्रिया की दखलंदाजी से युग्मक परिवहन (संचार) रोक दिया जाता है; फलत: गर्भाधान नहीं होता है। बंध्यकरण प्रक्रिया को पुरुषों के लिए ‘क्रवाहक-उच्छेदन ( बासैक्टोमी )’, तथा महिलाओं के लिए डिंबवाहिनी ₹ फैलोपी ) ‘नलिका उच्छेदन (दूबैक्टोमी )’ कहा जाता है।
  • शुक्रवाहक-उच्छेदन में अंडकोष (स्क्रोटम) में चीरा मारकर शुक्रवाहक का छोय सा भाग काटकर निकाल अथवा बांध दिया जाता है जबकि स्त्री के उदर में छोटा सा चीरा मारकर अथवा योनि द्वारा डिंबवाहिनी नली का छोटा सा भाग निकाल या बाँध दिया जाता है।

 

गर्भावस्‍था का चिकित्सीय समापन

  • गर्भावस्‍था पूर्ण होने से पहले जानबूझ कर या स्वैच्छिक रूप से गर्भ के समापन को चिकित्सीय गर्भावस्‍था समापन ( मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिगनेन्सी, एम टी पी) या प्रेरित गर्भपात कहते हैं।
  • पूरी दुनिया में हर साल लगभग 45 से 50 मिलियन (4.5-5 करोड) चिकित्सीय गर्भावस्‍था समापन कराए जाते हैं जो कि संसार भर की कुल गर्भावस्‍थाओं का 1/5 भाग है।
  • भारत सरकार ने इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए 1971 ई. में चिकित्सीय गर्भावस्‍था समापन को कानूनी स्वीकृत प्रदान कर दी थी। गर्भावस्‍था की पहली तिमाही में अर्थात्‌ गर्भावस्‍था के 12 सप्ताह तक. की अवधि में कराया जाने वाला चिकित्सीय गर्भावस्‍था समापन अपेक्षाकृत काफी सुरक्षित माना जाता है।
  • मीसोप्रोस्टोल (एक प्रोस्टाग्लैन्डिन) का माइफे-प्रिस्टोन के साथ एक प्रभावशाली जोड़ है। वैक्यूम एस्पिरेशन और शल्य क्रिया विधियाँ उसके बाद अपनाई जाती हे।
  • एम.टी.पी. का उपयोग उन अनचाही गर्भावस्‍थाओं को दूर करने में होता है जिस गर्भावस्‍था की नैरन्तर्यक्षतिपूर्ण होती है और जिसके कारण या तो माँ या भ्रूण या दोनों की ही मृत हो जाए।

यौन संचारित रोग

  • कोई भी रोग जो मैथुन द्वारा संचारित होंते हैं उन्हें सामूहिक तौर पर यौन संचारित रोग ( एस टी डी ) या रतिजरोग अथवा जनन मार्ग संक्रमण ( आर टी आईं ) कहा जाता है। ये बीमारियाँ बड़े पैमाने पर जीवाणु, विषाणु, प्रोयोजोअन्स, कवकों के प्रतिनिधि और बाह्यपरजीवी के कारण होती हैं।
  • इनमें से कुछ संक्रमण जैसे कि हैपेटाइटिस-बी तथा एच आई वी के संक्रमण, एक संक्रमित व्यक्ति के साझे प्रयोग वाली सुइयों (टीकों), शल्य क्रिया के औजारों तथा संदूषित रक्‍्ताधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) या फिर संक्रमित माता से उसके गर्भस्थ शिशु में भी संचारित हो सकते हैं।

 

  • यकृतशोथ-बी, जननिक परिसर्प तथा एच आई वी संक्रमण को छोड़कर बाकी सभी यौन रोग पूरी तरह से उपचार योग्य हैं; बशर्ते कि. इन्हें शुरूआती अवस्था में पहचाना एवं इनका उचित ढंग से पूरा . इलाज कराया जाए।
  • संक्रमित स्त्रियाँ अलक्षणी हो सकती हैं इसलिए, लंबे समय तक उनके संक्रमण का पता नहीं चल पाता।
  • 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग के लोगों में इन संक्रमण की घटनाएं बहुत अधिक हैं।
  • निम्न तरीकों से यौन संचारित रोग के संचारण को दूर किया जा सकता है –
    • अनजाने साथी या बहुत सारे साथियों के साथ के समागम से बचे रहना।
    • कन्‍डोम का प्रयोग समागम के दोरान करना।
    • यदि किसी बीमारी का पता लग जाए तो उसकी पूरी तरीके से उपचार करने के लिए किसी योग्य डाक्टर से विचार-विमर्श करना।
  • मानव पैपिलोमा विषाणु महिलाओं में सबसे सामान्य यौन संचारित रोग है तथा ग्रीवा कैंसर का मुख्य कारण है।

बंध्यता

  • दो वर्ष तक मुक्त या असुरक्षित सहवास के बावजूद गर्भाधान न हो पाने की स्थिति को बंध्यता कहते हैं।
  • ऐसे निःसंतान दंपतियों की मदद हेतु अब विभिन्‍न उपाय उपलब्ध हैं।
  • सहायक जनन प्रोद्योगिकी में सभी निषेचयी उपचार शामिल हैं जिसमें शुक्राणु और अण्डाणु दोनों ही को संभाला जाता है।
  • मुख्य ART की प्रक्रिया में शामिल है – माँ के अण्डाशूय से अण्डाणु को शल्यक्रिया की विधि द्वारा निकाला जाता है ओर फिर प्रयोगशाला में शुक्राणु के साथ उसका मिश्रिण किया जाता है और फिर दोबारा से माँ के शरीर में या किसी और औरत के शरीर में डाल दिया जाता है।

मुख्य ART में शामिल है

  • पत्रे निषेचन (आई.वी.एफ.)
  • युग्मनज अंतः डिम्बवाहिनी स्थानांतरण (जैड.आई.एफ.टी.)
  • अंत: कोशिकीय शुक्राणु निक्षेपण (आई.सी.एस.टी. )
  • युग्मकी अंतः डिम्बवाहिनी स्थानांतरण (जी.आई.एफ.टी.) सरोगेसी और सरोगेट मदरहुड
  • पात्रे निषेचन के बाद भ्रूण स्थानांतरण के द्वारा स्त्री के जनन मार्ग में भ्रूण को स्थापित करके संतान पाई जाती है। यह एक सामान्य विधि है के यहाँ हुआ था। श्रीमति ब्राउन की डिम्बवाहिनी नलिका अवरूद्ध थी।
  • इग्लैण्ड के डॉ. पेट्रिक स्टेप्टो और डॉ. रोबर्ट एडवर्ड्स दोनों का श्रीमति ब्राउन पर यह प्रयोग सफल रहा। विश्व की प्रथम परखनली शिशु (एक लड़की) का नाम लुईस जॉय ब्राउन था।
  • इसके बाद में ऑस्ट्रेलिया , संयुक्त राष्ट्र एवं कुछ अन्य देशों में भी परखनली शिशुओं ने जन्म लिया था। भारत में प्रथम परखनली शिशु, दुर्गा का जन्म 3 अक्टूबर 1978 में कलकत्ता में हुआ था। इनकी माता का नाम कनुप्रिया अग्रवाल था एवं इसको डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने उत्पन्न कराया था। परखनली शिशु कार्यक्रम में पत्नी या दाता स्त्री के अंडे तथा पति अथवा दाता पुरुष से प्राप्त किए गए शुक्राणुओं को एकत्रित करके प्रयोगशाला में अनुरूपी परिस्थितियों में युग्मनज बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

 

  • इस युग्मनज या प्रारंभिक भ्रूण (8 कोरक खण्ड तक) को डिम्बवाहिनी नलिकाओं में स्थानांतरित किया जाता है जिसे युग्मनज अंतः डिंबवाहिन स्थानांतरण अर्थात्‌ युग्मननज अंत: डिम्बवाहिनी स्थानांतरण (जॉइ्गोट इंट्रा फलोपियन टांसफर या जेड आई एफ टी) कहते हैं और जब भ्रूण 8 कोरकखण्ड से अधि क का होता है तो उसे परिवर्धन हेतु गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है। इसे अंत: यूटेराइन स्थानांतरण (आई यू टी) कहते हैं। जिन स्त्रियों में गर्भधारण की समस्या रहती है, उनकी सहायता के लिए जीवे निषेचन (इन-विवो फर्टीलाइजेशन-स्त्री के भीतर ही युग्मकों का : संलयन) से बनने वाले भ्रूणों को भी स्थानांतरण के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। अंतः कोशिकीय शुक्राणु निक्षेषण (आई सी एस आई) दूसरी विशिष्ट प्रक्रिया है जिसमें शुक्राणु को सीधे ही अंडाणु में अंत:क्षेपित किया जाता है।
  • वध्यता के ऐसे मामलों में जिनमें पुरुष साथी स्त्री को वीर्यसेचित कर सकने के योग्य नहीं है अथवा जिसके स्खलित वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बहुत ही कम है, ऐसे दोष का निवारण कृत्रिम वीर्यसेचन (ए आई ) तकनीक से किया जा सकता है। इस तकनीक में पति या स्वस्थ दाता से शुक्र लेकर कृत्रिम रूप से या तो स्त्री की योनि में अथवा उसके गर्भाशय में अण्डोत्सर्ग के समय प्रविष्ट किया जाता है। इसे अंत: गर्भाशय वीर्यसेचन ( आई यू आई ) कहते हैं।
  • आई यू आई का लक्ष्य शुक्राणुओं की संख्या में वृद्धि करना होता है जो फैलोपियन ट्यूब तक पहुँचकर निषेचन की संभावना में बढ़ोत्तरी करते हैं।
  • युग्मकी अंतः डिम्बवाहिनी स्थानांतरण ( जी.आई.एफ.टी. ) बच्चा उत्पन्न करने की एक नई तकनीक है। इस तकनीक का प्रयोग उस परिस्थिति में किया जाता है जहाँ स्त्रियाँ अण्डाणु उत्पन्न नहीं कर सकती परन्तु निषेचन और भ्रूण के परिवर्धन के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान कर सकती हैं। इस तकनीक में शुक्राणु (इलेक्ट्रो इजाकूलेशन द्ारा प्राप्त) एवं अण्डाणु (लैप्रोस्कोप द्वारा प्राप्त) को अण्डवाहिनी के मध्य भाग में एक पृथक केथेटर के द्वारा मादा में सासिक चक्र की प्रोलीफरेटिव अवस्था में प्रविष्ट कर दिया जाता हे। इसमें शरीर के बाहर निषेचन नहीं होता है।
  • इसका उपयोग उन रोगियों में नहीं किया जा सकता है जिनमें ‘फैलोपियन ट्यूब (डिम्बवाहिनी) क्षतिग्रस्त या अवरुद्ध हो चुकी हो। सरोगेट मदरह॒ड कृत्रिम वीर्यसेचन का एक उपफल है। इसका मतलब है कि एक औरत एक अन्य दम्पति के निषेचित अण्डाणु को अपने गर्भाशय में डालने की सहमति देती है। उसके बाद उस दूसरे दम्पति के लिए. वह उसका वहन पूरे प्रसतल तक करती है।

Leave a Comment