निषेचन एवं भ्रूण विकास

निषेचन एवं भ्रूण विकास

निषेचन

  • शुक्राणु के साथ एक अंडाणु के संलयन की प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं।
  • निषेचन केवल तभी होता है, यदि अण्डाशय से अवमुक्त डिम्ब, डिम्ब वाहिनी के एम्पुलरी-इस्थमिक जंक्शन तक पहुँचता है तथा योनि में अवमुक्त हुआ शुक्राणु गर्भाशय ग्रीवा व गर्भाशय से होता हुआ यहाँ पहुँचता है।
  • निषेचन द्वितीय अण्डक कोशिका को विभाजन पूर्ण करने के लिए प्रेरित करता है।
  • यह सामान्यत: तब घटित होता है जब शुक्राणु और अण्डाणु अण्डवाहिनी के ऊपरी भाग में एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

 

निषेचन की अवस्थाएं

  • संभोग के दौरान लिंग द्वारा वीर्य को योनि में अवमुक्त कर दिया जाता है। शुक्राणु सक्रियण ताजे स्खलित शुक्राणुओं में निषेचन की क्षमता नहीं होती है, बल्कि उन्हें सर्वप्रथम परिवर्तनों की एक श्रृंखला से गुजरता पड़ता है जिसे क्षमतायन कहा जाता है। स्खलन के बाद सक्रियण की प्रक्रिया होती है, जब गर्भाशय द्वारा अवमुक्त रसायन शुक्राणु के कोलेस्ट्रॉल आवरण को विखंडित कर देते हैं।
  • क्षमतायान का सम्बंध आसन्‍न सेमिनल प्लाज्मां प्रोटीन के निष्कासन, प्लाज्मा झिल्ली लिपिड्स तथा प्रोटीन के पुनर्गठन से है। क्षमतायान उस समय होता है जब शुक्राणु स्त्री जनन पथ में कुछ अवधि के लिए रहते हैं जैसा कि सामान्यतः युग्मक स्थानांतरण के दौरान होता है।

लघुबीजाणु या परागकण की संरचना

शुक्राणु-अण्ड कोशिका अभिज्ञान तथा बंधन प्रक्रिया

  • जोना पेल्लुसिडा का शुक्राणु के साथ बंधन प्रजाति विशिष्टता की उच्च स्तर के साथ संग्राहक-संलग्नीय परस्पर संक्रिया हे।
  • जोना पेल्लुसिडा ग्लाइकोप्रोटीन पर कार्बोहाइड्रेट समूह, शुक्राणु संग्राहक के रूप में कार्य करते हैं।
  • शुक्राणु तथा डिम्ब का सक्रियण ह शुक्राणु किसी डिम्ब को केंबल तभी निषेचित कर सकते हैं जब वे ” हाइलूरोनिडेज नामक रसायन का स्रावण करने में सक्षम हों तथा फर्टिलाइजिन (अम्लीय अमीनो अम्ल से निर्मित) नामक सतही प्रोटीन को धारण किए हुए हो।
  • डिम्ब फर्टिलाइजिन (ग्लाइकोप्रोटीन रू मोनो सेकेराइड्स +. अमीनो एसिड्स से निर्मित) नामक रसायन का स्राव करता है। यह जल के साथ मिलकर अण्ड-जल का निर्माण करता है जो अपनी प्रजाति के शुक्राणुओं को आकर्षित करता है।

कार्टिकल अभिक्रिया

  • कार्टिकल प्रतिक्रिया तब प्रारंभ होती है जब एक शुक्राणु सफलतापूर्वक एक अण्डाणु में प्रवेश कर चुका होता है ताकि पॉलीस्पर्मी (एक से अधिक शुक्राणु द्वारा अण्डे का निषेचन) को रोका जा सके।
  • अण्डाणु के साइटोप्लाज्म में कॉर्टिकल ग्रैन्यूल्स, जोना पेल्लुसिंडा में कुछ एंजाइम अवमुक्त करता है जो शुक्राणु बंधन स्थल को नष्ट कर देते हैं साथ ही साथ जोना पेल्लुसिडा के ग्लाइको प्रोटीन मैट्रिक्स को गाढ़ा तथा कठोर कर देता है। यह अन्य शुक्राणु को अण्डाणु में प्रवेश करने से रोकता है तथा यह सुनिश्चित करता है निर्मित युग्मनज ट्विगुणित हो।

निषेचन एवं भ्रूण विकास

एक्रोसोम प्रतिक्रिया

  • एक्रोसोम प्रतिक्रिया के द्वारा शुक्राणु एंजाइमेटिक छिद्रण के माध्यम से जोना पेल्लुसिडा को पार कर पाता है। जोना पेल्लुसिडा प्रोटीन जो शुक्राणु संग्राहक की भाँति कार्य करता है फिर यही कुछ अभिक्रियाओं के लिए उद्दीपन का भी कार्य करता है जिसके फलस्वरूप प्लाज्मा मेम्ब्रेन तथा बाहय एक्रोजोमल झिल्ली के बीच कई क्षेत्रों में संलयन को क्रियान्वित करता है।
  • जैसे-जैसे एक्रोसोम की प्रतिक्रिया आगे बढ़ती जाती है तथा शुक्राणु जोना पेल्लुसिडा से होकर गुजरता है, वेसे ही अधिक से अधिक प्लाज्मा झिल्ली तथा एक्रोसोमल अंतः वस्तु का गायब होना प्रारंभ हो जाता है। जब तक शुक्राणु जोना पेल्लुसिडा को पार करता है, इसके सिर के सम्पूर्ण अगले सतह तथा नीचे की आंतरिक एक्रोसोमल झिल्ली विलुप्त होने लगती हैं।
  • जब शुक्राणु किसी अण्डाणु तक पहुँचता है तो एक्रोसोम प्रतिक्रिया के फलस्वरूप यह जेली के आवरण को भेदने में सक्षम हो जाता है। शुक्राणु केरोना रेडियोटा की कूपिका कोशिकाओं के माध्यम से आगे की ओर बढ़ता है तथा जोना पेल्लुसिडा से आबद्ध हो जाता है। निषेचन के दौरान, एक शुक्राणु अंडाणु के पारदर्शी अंडावरण (जोना पेल्युसिडा) स्तर के संपर्क में आता है और अतिरिक्त शुक्राणुओं के प्रवेश को रोकने हेतु उसके उक्त स्तर में बदलाव प्रेरित करता है। इस प्रकार यह सुनिश्चित हो जाता है कि एक अंडाणु को केवल एक ही शुक्राणु निषेच्चित कर सकता है।
  • जब शुक्राणु के अग्रपिंडक अण्डे की सतह को छूते हैं, तो अण्डे का कोशिकाद्रव्य आगे की तरफ फूल जाता है और ग्रहणशील शंकु या निषेचित शंकु (एक क्षेत्र जहां से शुक्राणु अण्डों में प्रवेश करते हैं) को बनाता है।
  • एक्रोसोम पुटिका जेली आवरण के साथ संयुक्त हो करके पाचक एंजाइमों का स्रावण करती है जो ग्लाइकोप्रोटीन मैट्रिक्स को कोमल करती है। शुक्राणु पुन: कोमल जेली आवरण के माध्यम से अपना रास्ता आगे बढ़ाता है तथा अनावृत लघु प्रोटीन को अण्डाणु झिल्ली पर आबडद्ध कर देता है। अण्डाणु तथा शुक्राणु की झिल्ली फिर संलयित होकर शुक्राणु नामिक (तथा सेंट्रियोल) अण्डाणु में प्रवेश करता है।

यह द्वितीय अंडक के अर्धसूत्री विभाजन को प्रेरित करता है। दूसरा अर्धसुत्री विभाजन भी असमान होता है और इसके फलस्वरूप द्वितीय ध्रुवीय पिंड की रचना होती है और एक अगुणित अंडाणु (डिबाणु प्रसू या ऊओटिड) बनता है। शीघ्र ही शुक्राणु का अंडाणु के अगुणित केंद्रक के साथ संलयन होता है, जिससे कि द्विगुणित युग्मनज (जाइगोट) की रचना होती है।

बीज | बीज की संरचना | बीजपत्र | भ्रूण |

भ्रूण विकास

  • युग्मनज के बनने के बाद, यह फैलोपियन ट्यूब के माध्यम से गर्भाशय की ओर बढ़ने लगता है।
  • विदलन युग्मनज इकाई का समसूत्री विभाजन है जब अंडवाहिनी के संकीर्ण पथ (इस्थमस) से गर्भाशय की ओर बढ़ता है ओर तब यह 2, 4, 8, 16 संततिं कोशिकाओं, जिसे कोरकखंड कहते हैं, की रचना करता है।
  • विदलन सक्रिय कोशिकाद्रव्य में बहुत जल्दी ही घटित होता है।
  • मानव में समकक्ष पूर्णभंजी विदलन होता है।
  • मौरयूला 8-16 कोशिकीय अवस्था की एक ठोस गेंद है जो गुहारहित होती है। मौर॒यूला छोटे शहतूत की तरह दिखाई देती है। मौरयूला निषेचन के तीन दिन बाद बनता है।
  • कोरकखंड की दोबारा व्यवस्था के कारण मोरयूला कोरक में परिवर्तित हो जाता है।
  • कोरक के निर्माण को कोरक कन्दुक निर्माण कहते हें।
  • बड़े कोरक गुहा युक्त स्तनीय कोरक को कोरकपुटी कहते हैं। जिसकी संरचना निषेचन के 5 दिनों बाद शुरू होती है।
  • कोरकपुटी के तीन भाग होते हैं-पोषकोरक, अंतर कोशिका समूह एवं कोरक गुहा।
  • एक कोरकपुटी में कोरकखंड बाहरी परत में व्यवस्थित होते हैं जिसे पोषकोरक कहते हैं। कोशिकाओं के भीतरी समूह, जो पोषकोरक से जुड़े होते हैं, उन्हें अंतर कोशिका समूह कहते हैं।
  • योषकोरक स्तर गर्भाशय से संलग्न हो जाता है और अन्तर कोशिका समूह भ्रूण के रूप में विभेदित हो जाता है।
  • संलग्न होने के बाद, गर्भाशयी कोशिकाएँ तेजी से विभकत होती हैं और कोरकपुटी को आवृत्त कर लेती हैं। इसके परिणामस्वरूप कोरकपुटी गर्भाशय-अंतः स्तर में अन्तःस्थापित हो जाती है। इसे ही अंतररोष कहते हैं और बाद में यह गर्भावस्‍था का रूप धारण कर लेती है।
  • अंतरोंपण मुख्यतः निषेचन के बाद छठे से नवें दिन के बीच में घटित होती है।
  • अंतरोंपण की जगह अपरा के भाग को निश्चय करती है।
  • मनुष्य में अंतरोंपण अन्तरस्थ (10/0४/10५1) प्रकार की होती है जिसमें भ्रूण उस गर्भाशीय उपकला में दफन होता है जो उसे पूरी तरह से घेरे रहती है।
  • अंतर्रोपण के तुरंत बाद अन्तर कोशिका समूह (भ्रूण) बाह्यत्वचा ( एक्टोडर्म ) नामक एक बाहरी स्तर और अंतस्त्वचा ( एंडोडर्म ) नामक एक भीतरी स्तर में विभेदित हो जाता है। इस बाह्य त्वचा और अंतस्त्वचा के बीच जल्द ही मध्यजनस्तर ( मिजोडर्म ) प्रकट होता है।
  • ये तीनों ही स्तर वयस्कों में सभी ऊतकों (अंगों) का निर्माण करते हैं।
  • जनन स्तर की संस्थापना भ्रूणीय परिवर्धन कौ अंतिम अवस्था को शुरुआत करती हे अर्थात अंगों का निर्माण।

गर्भावस्‍था एवं अपरा प्रशिक्षण

  • गर्भावस्‍था एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें एक स्त्री अपने शरीर के अंदर एक निषेचित अण्डे को धारण करती है तथा मूलतः यह गर्भाधान से जन्म तक की अवधि होती है।
  • गर्भावस्‍था का प्रथम संकेत सामान्यतः मासिक स्राव का विफल होना होता है, हालाँकि प्रारंभ में कुछ स्त्रियों में रक्त स्राव होता है। गर्भावस्‍था के दौरान उत्पन्न हार्मोन्स100 (ह्यूमन कोरियोनोगोनेडोट्रॉफिक हार्मोन) (ह्यूमन प्लासेंटल लेक्टोजन) तथा रिलेक्सिन हैं।
  • अन्य हामोंन जैसे एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टोजेन, कार्टिसॉल, प्रोलेक्टिन तथा थॉयरॉक्सिन इत्यादि भी गर्भावस्‍था के दौरान अपनी मात्रा में वृद्धि कर लेते हैं जिससे भ्रूणीय विकास, माँ के अंदर होने वाले चयापचयी परिवर्तन तथा गर्भावस्‍था को बनाए रखने में सहायता मिलती हैं। ऐस्ट्रोजन, प्रोजेस्टोजन, कॉर्टिसॉल, प्रोलेक्टिन, थाइरॉक्सिन, आदि की भी मात्रा गर्भावस्‍था के दौरान माता के रक्त में कई गुणा बढ़ जाती है।
  • अपरा गर्भ और माँ के गर्भाशय के बीच का एक घनिष्ठ यांत्रकीय जोड़ है जो पोषण, श्वसन और उत्सर्जन के काम आता है। अपरा में बहुत ही छोटी अंगुली की तरह संरचनाएं है जिन्हें विलाई कहते हैं। गर्भाशय भित्ति उसके दूसरी तरफ दबाव सा बनाते हैं जिसे कृप्द्स कहते हैं।
  • मानवीय अपरा रुधिर जरायु जिसमें मातृ रक्त गर्भीय जरायु अंकुरक से सीधा ही आच्छादित होता हे, अपाती और मेटा चक्रिकाभ होता है।
  • सरल प्रकार के अपरा में, छ: अवरोधक मातृ रक्त को गर्भीय रक्त से अलग करते हैं। यह अवरोधक मनुष्य के अपर में खत्म हो जाते हैं। नाभिरज्जु एक लचीली डोरी के समान संरचना है जो गर्भ को अपरा के साथ नाभि पर जोड्ती है। इसमें दो नाभि धमनियां और एक शिरा शामिल होती है जो गर्भ को पोषण देती है और ‘ अपशिष्ट पदार्थ को निकालती है।
  • दोनों प्रकार की रुधिर वाहिकाएं नाभिरज्जु में वार्टनूस जैली से घिरी रहती है।
  • अपरा, भ्रूण को ऑक्सीजन तथा पोषण की आपूर्ति एवं कार्बन डाइऑक्साइड तथा श्रृण द्वारा उत्पन्न उत्सर्जी (एक्सक्रीटरी) अवशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करता है।

पुष्पी पादपो में लैंगिक जनन | Reproduction in flowering plant in hindi

अपरा, अंतःस्रावी ऊतकों का भी कार्य करता है और अनेकों हॉर्मोन जैसे कि मानव जरायु गोनेडोट्रॉपिन (100), मानव अपरा लैक्टोजन, ऐस्ट्रोजन, प्रोजेस्टोजनूस, आदि है जो मातृ कायिकीय अवस्थाओं को नियंत्रण करने के लिए आवश्यक होता है जिससे गर्भ का लगातार विकास होता रहे। गर्भावस्‍था के उत्तरार्ध की अवधि में अंडाशय द्वारा रिलैक्सिन नामक एक हॉममोन भी स्नावित किया जाता है।

प्रसव एवं दुग्धास्रवण

  • शर्भावस्‍था के नौ महीने के पश्चात्‌ गर्भ पूर्णरूप से विकसित और प्रसव के लि तैयार हो जाता है। शिशु-जन्म की प्रक्रिया को प्रसव कहा जाता है।
  • यह एक जटिल तंत्रिअंत:स्रावी क्रियाविधि द्वारा प्रेरित होते हैं। जिसमें, कॉर्टिसॉल, एस्टोजन और ऑक्सीटोसिन शामिल हैं। प्रसव के लिए गर्भाशय का शक्तिशाली संकुचन आवश्यक होता है। प्रसव की अवस्थाएं है
    • पहली अवस्था : अंग कण्ठ का विस्फारण
    • दूसरी अवस्था : बच्चे का निकलना
    • तीसरी अवस्था : अपरा ओर नाभिरज्जु का निकलना
  • अपर के प्रसव का संकेत पूर्ण विकसित गर्भ और अपरा से उत्पन्न होता है जो गर्भाशय के संकुचन को प्रेरित करता है उसे गर्भाय प्रभावली प्रतिवर्त कहते हें।
  • गर्भीय प्रभावी प्रतिवर्त ऑक्सीटोसिन के मोचन को बररच पु में से प्रेरित करता है जो गर्भाशीय पेशी पर कार्य करता है और कारण गर्भाशय का शक्तिशाली संकुचन होता है। गर्भग्रहण से लेकर जन्म तक के समय कों गर्भधारण की अवस्था कहते हैं। 280 दिनों की गर्भधारण की अवधि की गणना आखिरी आर्तवचक्र के समय से की जाती है (इसलिए 266 दिन)।
  • स्तनपान दुग्ध उत्पादन की एक प्रक्रिया है। गर्भावस्‍था के दौरान स्तन ग्रंथियों में कई प्रकार के परिवर्तन होते हैं और शिशु जन्म के बाद इससे दुग्धस्नावण होता है। जन्म के बाद प्रारम्भ के “ कुछ महीनों तक माता द्वाय नवजात शिशु को दुग्धपान ( स्तनपान) कराया जाता है। दुग्धस्रवण के दिनों तक जो दूध निकलता है उसे प्रथम स्तन्‍य या खीस कहते हैं, जिसमें कई प्रकार के प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) तत्व समाहित होते हैं जो नवजात शिशु में प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न करने के लिए परम आवश्यक होते हैं। उत्पादित दूध की मात्रा हामोंन प्रोलैक्टिन द्वारा नियंत्रित की जाती है। क्र का उत्पादन शिशु के स्तनपान के अवधि की प्रतिक्रिया स्वरूप होता है।
  • दुग्ध स्रावरण नियंत्रण –
    • उष्ध आवण की प्रक्रिया अंत:स्रावी ग्रोथियों के नियंत्रण में होती है। तथा ऑक्सीटोसिन (पिट्यूटरी ग्रॉथि से स्रावित) नामक से हार्मोन इस प्रक्रिया से संबंधित होते हैं।
    • लैक्टोजेनेसिस की प्रक्रिया गर्भावस्‍था के अंतिम चरण में प्रारंभ होती है। अपरा के शरीर से निष्कासित होने तथा प्रोजेस्टेरॉन, एस्ट्रोजेन तथा ह्यूमन प्लासेंटल लैक्योजन के स्तर में गिरावट के फलस्वरूप दुग्ध उत्पादन हेतु उद्दीपन प्राप्त होता है |

गुरुबीजाणु जनन

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